"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती भारत .
अभ्युत्थानं धर्मस्य तदात्मनम सृजाम्यहम.."
"हे भारत, जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ."
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुस्कृताम.
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे.."
'साधु पुरुषों के उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मै युग युग में प्रकट हुआ करता हूँ."
साधु पुरुषों, सज्जन मानव समाज को अपराधिओं के उत्पीरण से उद्धार के लिए तथा धर्म के स्थापना के लिए भगवान आते हैं. अर्थ है लोक रक्षा, शान्ति व्यवस्था स्थापित करने के लिए भगवान् युग युग में अवतरित होते हैं.और पुलिस विभाग तथा उसके अधीन कार्यरत छोटा या बड़ा पदाधिकारी उसी लोकरक्षा शांति व्यवस्था के कर्त्तव्य का निर्वहन करता है जिसमे व्यवधान होने पर, अव्यवस्था होने पर पुनः उसे व्यवस्थित करने, स्थापित करने के लिए भगवान् आते हैं.जो व्यक्ति पुलिस विभाग में छोटे या बड़े पद पर कार्यरत है और सत्य निष्ठा से अपना कर्त्तव्य पालन करता है तो वाही उसका स्वधर्म है. वही देश भक्ति है. वही "सत्यं परं धीमहि" की आराधना है.
पुलिस विभाग में इसके कर्मी को चौबीसों घंटे की ड्यूटी का सम्पादन करना होता है. हमारे देश भारत में पुलिस विभाग के कर्मियों को ना तो ड्यूटी के अनुसार वेतन मिलता है और ना उनके तथा उनके परिवार के लोगों को रहने तथा बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था है. देश में प्रजातंत्र है. राजनीति का अपराधीकरण हो गया है. संसद में, विधान सभाओं में, जिला परिषदों तथा ग्राम पंचायतों तक में धनवानों, बाहुबलिओं, अपराधकर्मियों की बहुलता हो गयी है. राजनितिक दलों द्वारा प्रायः बंद का आह्वान होता है.बंद में प्रभावित क्षेत्रों में सड़क मार्ग,रेलमार्ग को बाधित कर आम लोगों के कार्य कलाप ठप कर दिए जाते हैं. जनतंत्र में चाहे शासक दल हो या प्रतिपक्ष दोनों मिलकर हि देश का संचालन करते हैं. लेकिन जो सत्ता पक्ष से हटता है वह 'बंद' का आह्वान कर लोकव्यवस्था भंग करता है. इसमे पुलिस विभाग के कार्य का बोझ बढ़ जाता है.हर महीने कई राज्यों में बारूदी सुरंग विस्फोट कर माओवादी पुलिस जवानों को मार रहे हैं. हर रोज पुलिस कर्मी लोक रक्षण के कार्यों में शहादत दे रहे हैं. शहीदों की कीमत सरकार कुछ पैसों से चुकाती है. लेकिन पुलिस ड्यूटी में मारे गए जवानों की माँ को पुत्र कहाँ वापस आता है?पत्नी का पति तथा बच्चों के पिता जो पुलिस कार्य में मारे जातें हैं वे कहाँ लौटते हैं? आज भी शिवी, दधीचि की भांति पुलिस कर्मी लोकरक्षा , शांति व्यवस्था के लिए अपना खून पसीना बहता है. पुलिस का कार्य संपादन स्वधर्म पालन है और यह सभी सेवा धर्मों में श्रेष्ठ धर्म है. निष्पक्ष, सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ पुलिस कर्मी के हर कार्य संपादन से लोक रक्षण एवं शांति व्यवस्था का वातावरण बनता है. कर्त्तव्य निष्ठ पुलिस कर्मी के क्षेत्र में निर्वाधित आर्थिक उद्योग चलते हैं. यात्री निरापद होते हैं. दिन भर श्रम करने वाले लोग चेहे झोपड़ी में रहते हैं या महल में चैन से सोते हैं. पुलिस कर्मी को बराबर ध्यान रखना चाहिए-"स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह:." पुलिस का कठिन कार्य सम्पादित करते हुए अपना बलिदान भी कर देना श्रेयस्कर है. लेकिन पुलिस के कार्य संपादन में भय से, लोभ से, अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए पुलिस के नियामक कार्यों को छोड़ना परधर्म को स्वीकार करना है जो भयावह है.मनुष्य का शरीर "साधानधाम" कहा जाता है. जिसको सहज ढंग से पुलिस कार्य करने के लिए वर्दी मिल जाये तो उस वर्दी धारी को लोक रक्षण के कार्य में, शांति व्यवस्था बनाये रखने में लोकरक्षा का कवच बना देना चाहिए. लोक रक्षण का कार्य उत्कृष्ट सेवा धर्म है. राजनैतिक हस्तक्षेप से, आतंकवाद से, उग्रवादियों के अत्याचार से तथा अपराधियों के उत्पीड़न से जूझने का अवसर पुलिसकर्मी को हि मिलाता है. इसे अपना सौभाग्य मानकर अपना स्वधर्म पालन करना चाहिए.
कृष्ण चन्द्र दूबे
२४.०४.२०१०